किशनगंज। जैन धर्म के प्रमुख आध्यात्मिक पर्व पर्युषण महापर्व के तीसरे दिन स्थानीय तेरापंथ भवन में समायिक दिवस श्रद्धा और आध्यात्मिक उत्साह के साथ मनाया गया। कार्यक्रम उपासक द्वय महावीर दुगड़ एवं झब्बर दुगड़ के सान्निध्य में आयोजित हुआ। इस अवसर पर प्रवचन में समायिक के आध्यात्मिक महत्व पर प्रकाश डालते हुए बताया गया कि जैन धर्म में सामायिक व्रत का विशेष महत्व है। दीक्षा ग्रहण करते समय साधु-साध्वी जीवनपर्यंत पापकारी प्रवृत्तियों के त्याग का संकल्प लेते हैं। श्रावक भी 48 मिनट की सामायिक साधना के दौरान राग-द्वेष से मुक्त होकर समता के भाव में रहने का प्रयास करता है तथा सभी जीवों के प्रति अभय और अहिंसा की भावना रखता है।
प्रवचन में जीव, अजीव, पाप, पुण्य सहित नव तत्वों की विस्तार से जानकारी दी गई। बताया गया कि नव तत्वों में आस्था, संवर और निर्जरा के माध्यम से व्यक्ति कर्मों के क्षय की दिशा में आगे बढ़ सकता है और मोक्ष का मार्ग प्रशस्त कर सकता है। समायिक का अर्थ समता में स्थित होना बताया गया। कार्यक्रम में उपस्थित श्रावक-श्राविकाओं ने निर्धारित विधि के अनुसार सामायिक साधना की। इस दौरान कुछ समय के लिए सांसारिक गतिविधियों से विरत होकर आत्मचिंतन, स्वाध्याय और आध्यात्मिक साधना की गई।
वक्ताओं ने कहा कि समायिक केवल धार्मिक क्रिया नहीं, बल्कि आत्मा को अंतर्मुखी बनाने वाली साधना है। इसके माध्यम से व्यक्ति राग-द्वेष, क्रोध, मान, माया और लोभ से ऊपर उठकर समता और शांति की ओर बढ़ने का प्रयास करता है। बाहरी संसार से कुछ समय के लिए विरत होकर आत्मचिंतन करने से आत्मशुद्धि की दिशा में आगे बढ़ने की प्रेरणा मिलती है। समायिक दिवस के अवसर पर श्रावक-श्राविकाओं ने शांत एवं एकाग्र भाव से साधना करने का संकल्प लिया। कार्यक्रम में तेरापंथ समाज के श्रावक-श्राविकाओं सहित बड़ी संख्या में धर्मप्रेमी उपस्थित रहे। तेरापंथ भवन का वातावरण समता, संयम और आत्मजागरण के आध्यात्मिक भावों से ओतप्रोत रहा।
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