सिनेमा के पटल पर कभी-कभी ऐसी कृतियाँ अवतरित होती हैं, जिन्हें केवल मनोरंजन के पैमाने पर मापना उनके साथ अन्याय होगा। डॉ. विशाल चतुर्वेदी के निर्देशन और 21-वर्षीय अनुप्रिया नागर द्वारा निर्मित 'हनुमान अंश' (7 अगस्त 2026 को प्रदर्शित) एक ऐसी ही विरल और अलौकिक सिनेमाई अनुभूति है। यह मात्र एक बायोपिक (जीवनी) नहीं है, बल्कि बीसवीं सदी के महान संत नीम करोली बाबा (महाराज जी) के जीवन और उनके आध्यात्मिक वट-वृक्ष की जड़ों तक की एक भावपूर्ण यात्रा है। यह फिल्म वर्तमान समय के कोलाहल से दूर, आत्मा को शांत करने वाला एक सिनेमाई 'सत्संग' बन गई है।

फिल्म की कथा तेरह वर्षीय बालक लक्ष्मण दास (शौभिनव सत्या) से आरंभ होती है, जो अपनी माता के निधन के पश्चात इस विश्वास के साथ घर छोड़ देता है कि केवल ईश्वरीय प्रेम ही उसे उसकी माँ से पुनः मिला सकता है। उसका यह गमन कोई पारंपरिक संन्यास नहीं, बल्कि श्री हनुमान के माध्यम से भगवान राम से एकाकार होने की एक अबोध और पवित्र लालसा है। फिल्म लक्ष्मण के 'नीम करोली बाबा' बनने तक की यात्रा को अत्यंत संवेदनशीलता के साथ पिरोती है। समीक्षकों ने विशेष रूप से उस दृश्य की भूरि-भूरि प्रशंसा की है जहाँ एक महंत बालक लक्ष्मण की अद्भुत सिद्धियों (जैसे प्रकृति, वृक्षों और पक्षियों से संवाद) को देखकर उसे अपना उत्तराधिकारी बनाना चाहता है, किंतु वैराग्य की प्रतिमूर्ति वह बालक विनम्रता से कहता है, "महंत जी, क्या आप मुझे उसी आसक्ति में बांधना चाहते हैं?" यह संवाद फिल्म की वैचारिक गहराई और आध्यात्मिक चेतना का शिखर है।

फिल्म का सबसे सशक्त और रोमांचकारी हिस्सा वह ऐतिहासिक ट्रेन प्रसंग है। जब एक ब्रिटिश अधिकारी बिना टिकट यात्रा करने के आरोप में लक्ष्मण को प्रथम श्रेणी के डिब्बे से उतार देता है, तो ट्रेन का इंजन रहस्यमयी ढंग से काम करना बंद कर देता है। जब तक बाबा को सम्मानपूर्वक वापस नहीं बुलाया जाता, ट्रेन एक इंच भी नहीं सरकती। इस दृश्य को जिस सहजता और बिना किसी अतिरंजित मेलोड्रामा के प्रस्तुत किया गया है, वह दर्शकों के मन में अगाध श्रद्धा उत्पन्न करता है। शौभिनव सत्या ने बाबा के बाल सुलभ लेकिन रहस्यमयी व्यक्तित्व को अपनी आँखों और शांत भाव-भंगिमाओं से जिस तरह जीवंत किया है, वह अभिनय की एक नई परिभाषा गढ़ता है।

तकनीकी और कलात्मक मोर्चे पर, 'हनुमान अंश' सादगी में सुंदरता का उत्कृष्ट उदाहरण है। विशाल बावा की सिनेमैटोग्राफी भारत के हरे-भरे परिदृश्यों, शांत झीलों और ग्रामीण अंचलों को एक कैनवास की तरह प्रस्तुत करती है, जो सीधे हृदय को स्पर्श करती है। पृष्ठभूमि संगीत (साधु सुशील तिवारी द्वारा) कथा के 'भक्ति रस' को इतना सघन कर देता है कि सिनेमाघर का वातावरण किसी मंदिर के गर्भगृह सा प्रतीत होने लगता है। मात्र 1.75 से 2 करोड़ रुपये के अल्प बजट में बनी यह फिल्म अपनी शुद्धता और दर्शकों के 'माउथ-पब्लिसिटी' के दम पर 100 करोड़ के क्लब में शामिल होकर एक ऐतिहासिक चमत्कार बन चुकी है।

दर्शक इस फिल्म को आधुनिक और हिंसक सिनेमा (जैसे 'टॉक्सिक' आदि) के बीच एक 'डिटॉक्स' यानी मानसिक शुद्धि का माध्यम मान रहे हैं। प्रसिद्ध अभिनेत्री कंगना रनौत ने इस फिल्म की सटीक व्याख्या करते हुए कहा है कि "यह एक फिल्म नहीं बल्कि सत्संग है... अपनी थेरेपी छोड़ें और इसे देखने जाएँ"। यह फिल्म उन लोगों के लिए भी एक मौन उत्तर है जो सिद्धियों और भारतीय दर्शन को शंका की दृष्टि से देखते हैं।

इस सिनेमाई यज्ञ की पूर्णता इसके संगीतमय पक्ष और इसमें पिरोए गए हृदयस्पर्शी भजनों की चर्चा के बिना सर्वथा अधूरी है। फिल्म में संगीत केवल दृश्यों के बीच का अंतराल भरने का साधन नहीं, बल्कि स्वयं में एक जीवित और स्पंदित पात्र है। विशेष रूप से फिल्म में उपयोग किया गया भजन 'जब ज़िद पे आई पार्वती' श्रोताओं को एक ऐसे आध्यात्मिक लोक में ले जाता है, जहाँ शिव और शक्ति के संवाद के माध्यम से वैराग्य और भक्ति का अनूठा रस उत्पन्न होता है। इसके साथ ही, जीवन के शाश्वत सत्य, नश्वरता और जन्म-मृत्यु के चक्र को अत्यंत मार्मिक ढंग से रेखांकित करने वाला भजन 'आवागमन' दर्शकों की आँखों में अनायास ही अश्रु ले आता है। इन गीतों में शब्दों का कोई कृत्रिम आडंबर नहीं है, बल्कि उस शून्य और अद्वैत की गूंज है जिसे महाराज जी ने जीवन भर जिया।

'हनुमान अंश' एक सिनेमाई यज्ञ है जिसमें भक्ति, वैराग्य और निस्वार्थ प्रेम की आहुति दी गई है। यह एक ऐसी कलाकृति है जो आपको बाहर से नहीं चौंकाती, बल्कि आपके भीतर उतरकर आपको भीतर से रूपांतरित कर देती है। यदि सिनेमा का उद्देश्य मानवीय चेतना का परिष्कार करना है, तो 'हनुमान अंश' हाल के दशकों की सबसे सफल और पवित्र भारतीय फिल्म है।