NF रेलवे का सबसे बड़ा जंक्शन 'कटिहार' क्यों है उपेक्षित? कमाई करोड़ों में, पर सुविधाओं और ट्रेनों के नाम पर सिर्फ ‘सौतेला व्यवहार’
गुवाहाटी और नई जलपाईगुड़ी के बाद कटिहार पूर्वोत्तर सीमा (NF) रेलवे का तीसरा सबसे बड़ा स्टेशन है।
पैसेंजर फुटफॉल (यात्रियों की संख्या) के लिहाज से कटिहार पूरे जोन का सबसे बड़ा जंक्शन है।
वर्ष 2024-25 के आंकड़ों के अनुसार, इस जंक्शन से रेलवे को 160 करोड़ रुपये से अधिक की रिकॉर्ड आमदनी हुई।
दशकों की मांग के बावजूद कटिहार से दक्षिण भारत के लिए एक भी ओरिजिनेटिंग (सीधी) ट्रेन नहीं दी गई।
कटिहार: कमाई के मामले में अव्वल, लेकिन सुविधाओं के नाम पर शून्य! पूर्वोत्तर सीमा रेलवे (NFR) के सबसे महत्वपूर्ण और व्यस्ततम जंक्शनों में से एक 'कटिहार जंक्शन' आज भी मालीगांव (गुवाहाटी) मुख्यालय के सौतेले व्यवहार का दंश झेल रहा है। यात्रियों की भारी संख्या और करोड़ों रुपये का राजस्व देने के बावजूद, इस ऐतिहासिक स्टेशन को हमेशा नजरअंदाज किया गया है। स्थानीय लोगों, यात्री संगठनों और जनप्रतिनिधियों का कहना है कि जब रेलवे को कमाने की बारी आती है, तो कटिहार और पूरे सीमांचल को प्राथमिकता दी जाती है, लेकिन जब जनता को बुनियादी सुविधाएं और नई ट्रेनें देने का समय आता है, तो केवल उपेक्षा और बहानेबाजी हाथ लगती है।
दक्षिण भारत के लिए दशकों से तरस रहा कटिहार, मिला 'अमृत भारत' का झुनझुना
सालों से कटिहार के सांसद, विधायक, चैंबर ऑफ कॉमर्स और तमाम यात्री संगठन कटिहार से बेंगलुरु, हैदराबाद, केरल और चेन्नई के लिए सीधी (ओरिजिनेटिंग) ट्रेनें या फिर गुवाहाटी और न्यू जलपाईगुड़ी (NJP) से कटिहार होकर दक्षिण भारत के लिए ट्रेनें चलाने की गुहार लगाते रहे हैं। दक्षिण भारत में इलाज, पढ़ाई और रोजगार के लिए सीमांचल से हर साल लाखों लोग जाते हैं, लेकिन उन्हें हमेशा एनएफ रेलवे द्वारा निराश ही किया गया है।
हैरत की बात यह है कि पिछले कुछ वर्षों में बंगाल और असम के कई छोटे-छोटे स्टेशनों से दक्षिण भारत के लिए नई ट्रेनें शुरू कर दी गईं, पर कटिहार को दरकिनार कर दिया गया। पिछले वर्ष रेल मंत्री द्वारा माननीय विधायक तारकिशोर प्रसाद को जोगबनी से इरोड (तमिलनाडु) के लिए 'दैनिक' ट्रेन शुरू करने की स्वीकृति देने की बात कही गई थी, जिससे स्थानीय लोगों में खुशी की लहर दौड़ गई थी। लेकिन जब ट्रेन शुरू हुई, तो पता चला कि वह दैनिक नहीं बल्कि साप्ताहिक (वीकली) है, और वह भी 'अमृत भारत एक्सप्रेस'। पूरी तरह से सेकेंड क्लास सीटिंग और स्लीपर कोच वाली इस ट्रेन में एक भी एसी कोच नहीं है, जिससे बुजुर्गों, मरीजों और पर्यटकों को कोई बड़ी राहत नहीं मिली।
कटिहार की पीट लाइन का इस्तेमाल, पर ट्रेनें दूसरों को!
सीमांचल की जनता के साथ क्रूर मजाक का आलम यह है कि पश्चिम बंगाल के छोटे शहरों जैसे राधिकापुर और बालुरघाट से बेंगलुरु और दक्षिण भारत के लिए सीधी ट्रेनें दी गई हैं। हद तो यह है कि इन ट्रेनों का मेंटेनेंस (रखरखाव) कटिहार जंक्शन के पीट लाइन में होता है, लेकिन खुद कटिहार की जनता को इनमें जगह नहीं मिलती। हाल ही में जेडआरयूसीसी (ZRUCC) की बैठक में सांसद तारिक अनवर ने जब इस मुद्दे को उठाते हुए बेंगलुरु, चेन्नई और हैदराबाद के लिए सीधी ट्रेन की मांग दोहराई, तो रेलवे जोन की ओर से अजीबोगरीब दलील दी गई कि "कटिहार में नई ट्रेन चलाने की कैपेसिटी (क्षमता) ही नहीं बची है।" बुद्धिजीवियों का सवाल है कि यदि क्षमता नहीं है, तो दूसरे स्टेशनों की ट्रेनों का मेंटेनेंस करने और उनके कोचिंग डिपो के तौर पर कटिहार का इस्तेमाल करने की क्षमता कहाँ से आ जाती है?
राजधानी एक्सप्रेस भी छीनी, कटिहार को किया 'रूट' से गायब
कभी वाया कटिहार-बरौनी रूट को उत्तर भारत और वाया मालदा रूट को कोलकाता और दक्षिण भारत के लिए रीढ़ माना जाता था। लेकिन अब एनएफ रेलवे कटिहार से गुजरने वाली प्रीमियम ट्रेनों को भी छीनने पर आमादा है। कुछ समय पहले कटिहार से होकर चलने वाली और यहाँ से सैकड़ों की बुकिंग पाने वाली अगरतला-आनंद विहार तेजस राजधानी एक्सप्रेस का मार्ग अचानक बदलकर उसे मालदा-जमालपुर-पटना रूट पर डाइवर्ट कर दिया गया। इसके खिलाफ डिविजनल ऑफिस के बाहर विरोध-प्रदर्शन भी हुए थे।
अब यही कहानी दोबारा दोहराई गई है। हाल ही में उद्घाटित 20507/08 मिजोरम राजधानी एक्सप्रेस के मार्ग से भी कटिहार को पूरी तरह गायब कर दिया गया है। एनएफ रेलवे ने इस राजधानी को भी वाया मालदा चलाने की घोषणा की है, जबकि वाया मालदा का रूट वाया कटिहार के मुकाबले लगभग 170-180 किलोमीटर अधिक लंबा है। रेलवे अपने डिविजनल हेड ऑफिस (कटिहार) को नजरअंदाज करने के लिए लंबे मार्ग से राजधानी ट्रेन चलाने को तैयार है, जो यात्रियों के समय और संसाधनों की सरासर बर्बादी है।
वंदे भारत की आस में टकटकी लगाए बैठे हैं सीमांचल के लोग
कटिहार से कोलकाता (हावड़ा/चितपुर) के लिए दिन के समय चलने वाली वंदे भारत एक्सप्रेस की मांग बरसों पुरानी है। कटिहार होकर चलने वाली हाटे बाजारे एक्सप्रेस जैसी तमाम ट्रेनों में यात्रियों की बंपर भीड़ और टिकटों की लंबी वेटिंग लिस्ट इस रूट की लोकप्रियता और जरूरत को खुद बयां करती है। इसके बावजूद रेलवे प्रशासन कटिहार की इस बेहद जायज मांग पर आंखें मूंदे बैठा है।
राजस्व हमारा, सुविधाएं दूसरों को क्यों?
कटिहार के व्यापारियों, युवाओं और बुद्धिजीवियों में इस अनदेखी को लेकर गहरा आक्रोश है। लोगों का कहना है कि जब बात सीमांचल से मक्का, सीमेंट और अन्य कृषि उत्पादों से मालभाड़ा (फ्रेट) कमाने और पैसेंजर टिकटों से राजस्व वसूलने की होती है, तो रेलवे तत्परता दिखाता है। मगर जैसे ही सुविधाओं के विस्तार और दक्षिण भारत की सीधी कनेक्टिविटी की बात आती है, एनएफ रेलवे कटिहार को भूल जाता है। सीमांचल की जनता का यह आक्रोश आने वाले दिनों में रेलवे के लिए बड़े आंदोलन का रूप ले सकता है, क्योंकि अब उपेक्षा की हदें पार हो चुकी हैं।
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