भारतीय रेलवे परिवहन के क्षेत्र में एक नए और स्वच्छ युग की शुरुआत करने जा रहा है। पिछले 12 वर्षों में 99 प्रतिशत से अधिक ब्रॉड गेज मार्गों के तीव्र विद्युतीकरण से आयातित डीजल पर निर्भरता कम करने के बाद, अब देश अपनी पहली स्वदेशी हाइड्रोजन फ्यूल सेल ट्रेन को हरी झंडी दिखाने के लिए तैयार है। कोयले और भाप वाले इंजनों से शुरू हुआ रेलवे का यह सफर अब सीधे हरित क्रांति की ओर बढ़ चुका है। पारंपरिक डीज़ल इंजनों के विपरीत—जो ईंधन जलाकर धुआं छोड़ते हैं—यह ट्रेन प्रोटॉन एक्सचेंज मेम्ब्रेन (PEM) फ्यूल सेल का उपयोग करती है। इसमें सिलेंडरों में जमा हाइड्रोजन और हवा की ऑक्सीजन मिलकर सीधे बिजली पैदा करते हैं, जिससे कर्षण मोटरें (traction motors) चलती हैं। इस इलेक्ट्रोकेमिकल प्रक्रिया में टेलपाइप से कार्बन उत्सर्जन के बजाय, केवल पानी की भाप और हल्की ऊष्मा (गर्मी) निकलती है। बिना किसी दहन के अपनी बिजली खुद बनाने वाली यह ट्रेन रेलवे के कार्बन फुटप्रिंट को पूरी तरह खत्म कर देती है।
वैश्विक स्तर पर देखें तो जर्मनी व्यावसायिक हाइड्रोजन ट्रेन शुरू करने वाला पहला देश है, जबकि फ्रांस, इटली, चीन और जापान जैसे देश अभी इसके प्रायोगिक और सीमित परिचालन पर काम कर रहे हैं। इन विदेशी ट्रेनों में आमतौर पर सिर्फ दो से चार डिब्बे होते हैं और वे छोटे क्षेत्रीय मार्गों तक सीमित हैं। इसके बिल्कुल विपरीत, भारत ने अपनी इस स्वदेशी ट्रेन को 10 कोच वाली एक उच्च-क्षमता वाली यात्री सेवा के रूप में तैयार किया है, जो लगभग 2,600 यात्रियों को ले जा सकती है। इस ट्रेनसेट में दो हाइड्रोजन ड्राइविंग पावर कार (DPC) और आठ ट्रेलर कोच (TC) शामिल हैं। दोनों सिरों पर लगी ड्राइविंग पावर कारें 1,200 किलोवाट (1600 HP) की बिजली उत्पन्न करती हैं। शुरुआत में यह ट्रेन उत्तरी रेलवे के 89 किलोमीटर लंबे जींद-सोनीपत खंड पर चलेगी। 75 किमी प्रति घंटे की सुरक्षित परिचालन गति और 110 किमी प्रति घंटे की अधिकतम डिज़ाइन गति के साथ, यह ट्रेन मुख्य रूप से जींद जंक्शन, गोहाना जंक्शन और सोनीपत को जोड़ेगी। इसके विस्तृत रूट की बात करें तो, यह ट्रेन अपने सफर के दौरान जींद सिटी, पांडु पिंडारा जंक्शन, ललित खेड़ा हॉल्ट, भम्भेवा, इसापुर खेरी हॉल्ट, बुटाने हॉल्ट, खंडराई हॉल्ट, राब्रा हॉल्ट, लाठ हॉल्ट, मोहना, बरवासनी हॉल्ट और सोनीपत न्यू सहित सभी मध्यवर्ती स्टेशनों और प्रस्तावित ठहरावों पर रुकेगी।
इतने बड़े प्रोजेक्ट को सुचारू रूप से चलाने के लिए रेलवे ने सिर्फ एक ट्रेन नहीं, बल्कि पूरा एक नया इकोसिस्टम तैयार किया है। इसके तहत हरियाणा के जींद में भारत की सबसे बड़ी रेलवे हाइड्रोजन रिफ्यूलिंग सुविधा स्थापित की गई है। इस प्लांट में इलेक्ट्रोलाइसिस के जरिए (बिजली और पानी का उपयोग करके) ग्रीन हाइड्रोजन बनाई जाती है। फिर इसे कम जगह में रखने के लिए 500 बार (bar) तक संपीड़ित (compress) किया जाता है और अंत में दो स्वतंत्र डिस्पेंसरों के जरिए 350 बार के नियंत्रित दबाव पर ट्रेन के सिलेंडरों में भरा जाता है। एक बार में लगभग 3,000 किलोग्राम हाइड्रोजन का भंडारण करने वाले इस प्लांट को पेट्रोलियम और विस्फोटक सुरक्षा संगठन (PESO) द्वारा मंजूरी मिली है। यह पूरा प्रोजेक्ट स्वदेशी तकनीकी क्षमताओं का एक उत्कृष्ट उदाहरण है, जिसका नेतृत्व भारतीय रेलवे कर रहा है। इसके लिए RDSO ने तकनीकी विशिष्टताएं और डिज़ाइन तैयार किए, मेसर्स मेधा सर्वो ड्राइव्स ने ट्रेनसेट को इंटीग्रेट किया, और इंटीग्रल कोच फैक्ट्री (ICF) ने इसका बाहरी डिज़ाइन तैयार किया है।
चूंकि हाइड्रोजन रंगहीन, गंधहीन और स्वादहीन गैस है, और यह अत्यधिक ज्वलनशील होती है, इसलिए रेलवे ने सुरक्षा को सबसे ऊपर रखते हुए 'गहन सुरक्षा' (Defense in Depth) का अंतरराष्ट्रीय सिद्धांत अपनाया है। ट्रेन में हाइड्रोजन रिसाव, असामान्य गर्मी, आग या धुएं का पता लगाने के लिए कई स्वतंत्र सेंसर्स और बहुस्तरीय प्रणालियां मौजूद हैं। इसके अलावा, निरंतर वेंटिलेशन से हवा का प्रवाह बना रहता है, ताकि रिसाव होने पर गैस जमा न हो। कोई भी विसंगति होने पर ऑटोमैटिक शट-ऑफ सिस्टम बिना किसी मानवीय मदद के गैस सप्लाई तुरंत रोक देता है। लोको पायलट के केबिन को भी एक विशेष आपातकालीन मोड और रियल-टाइम निगरानी स्क्रीन के साथ सुरक्षित बनाया गया है। जींद प्लांट में भी लीकेज और फायर डिटेक्शन के साथ वाटर स्प्रिंकलर जैसी सुरक्षा व्यवस्थाएं हैं। इन सभी प्रणालियों को NFPA-2 और ISO 19880 जैसे अंतरराष्ट्रीय मानकों पर डिजाइन किया गया है और जर्मनी की मशहूर संस्था 'TUV SUD' द्वारा इसका तृतीय-पक्ष (third-party) सुरक्षा मूल्यांकन किया गया है। पटरियों पर उतरने से पहले इस ट्रेन ने लोड बॉक्स, रेडियो फ्रीक्वेंसी, दोलन (oscillation) और आपातकालीन ब्रेक दूरी जैसे कई कड़े परीक्षण सफलतापूर्वक पास किए हैं। भविष्य में इस तकनीक को कालका-शिमला जैसे हेरिटेज मार्गों पर भी उतारने की योजना है, जो राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन और भारत के दीर्घकालिक 'नेट जीरो' (Net Zero) लक्ष्य को हासिल करने में एक मजबूत कदम साबित होगा।
हालांकि, इस महत्वाकांक्षी परियोजना की सफलता के मार्ग में कई बड़ी ढांचागत और आर्थिक चुनौतियां भी खड़ी हैं। वर्तमान में ग्रीन हाइड्रोजन का उत्पादन पारंपरिक ईंधनों की तुलना में काफी महंगा है, जिससे इसकी व्यावसायिक व्यवहार्यता (commercial viability) और फंडामेंटल रिटर्न पर स्वाभाविक रूप से सवाल उठते हैं। पूरे देश के विशाल रेलवे नेटवर्क के लिए नए सिरे से हाइड्रोजन रिफ्यूलिंग इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार करना भारी पूंजीगत व्यय की मांग करता है। इसके अतिरिक्त, भारतीय मौसम की चरम स्थितियों में इन जटिल PEM फ्यूल सेल और उच्च दबाव वाले सिलेंडरों का सुचारू रूप से रखरखाव करना किसी बड़ी कसौटी से कम नहीं होगा। ऐसे में, यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि भविष्य में इन वित्तीय और परिचालन बाधाओं को पार करते हुए, क्या यह तकनीक बड़े पैमाने के इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स के लिए लंबे समय में एक लागत-प्रभावी (cost-effective) और व्यावहारिक विकल्प बन पाती है या नहीं।
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